रमज़ान के रोज़े की फ़ज़ीलत और मसाइल – Ramadan ke Roze Aur Masail Hindi

रमज़ान के रोज़े की फ़ज़ीलत और मसाइल – Ramadan ke Roze Aur Masail Hindi

Ramadan ke Roze Aur Masail Hindi

Ramadan ke Roze Aur Masail Hindi – रमजान का इस्लाम धर्म में काफी महत्व है। रमजान में रोजा रखना अल्लाह की तरफ से दिया गया आदेश है, जिसे हर हाल में पूरा करना ही होता है। कुछ अपवाद छोड़कर, मसलन कोई काफी बीमार है तो उसे रियायत है। रमजान का जितना धार्मिक महत्व है, उतना ही वैज्ञानिक भी। रमजान में रोजा रखने से शरीर को विकारों से दूर करने में मदद मिलती है। शरीर का तंत्र और अपनी दिनचर्या व्यवस्थित हो जाती है। दूसरा, इस दौरान पता चलता है कि समय का क्या महत्व है। कितने बजे उठना है और कितने बजे सोना है। कितने बजे खाना है। सारे काम समय से किए जाते हैं।

रोजे का सामाजिक महत्व भी होता है। इसमें भूख और प्यास की अहमियत का पता चलता है। इसी तरह प्यासे व्यक्ति के बारे में भी समझ हो जाती है। पता चलता है कि पानी जीवन के लिए कितना जरूरी है। इसका कितना महत्व है।

रमजान से धार्मिक सौहार्द भी जुड़ा है। जब हम इफ्तार करते हैं तो लोगों के घर भी भोजन भेजते हैं। या लोगों को अपने घर बुलाते हैं। रमजान में यह हिदायत है कि आप जब भी अच्छा खाएं तो यह देख लें कि पड़ोसी भूखा तो नहीं है। इस माह जकात देना होता है। अपनी बचत का ढाई प्रतिशत हिस्सा। इसके तहत रिश्तेदारी में कोई गरीब है तो उसकी मदद करें। कोई गरीब नहीं है तो पड़ोसी या फिर मोहल्ले में, जो भी हो उसकी मदद करें। कुल मिलाकर रमजान में सामाजिक ताना-बाना कुछ इस तरह गूथा गया है कि कोई भी ईद के दिन अच्छे पकवानों और नए कपड़ों के बिना नहीं रहता है

रोजा – कुरआन-ऐ-माजिद की रौशनी में – Ramadan ke Roze Aur Masail Hindi

“ऐ लोगो! जो ईमान लाए हो. तुम पर रोजे फर्ज कर दिए गए. जिस तरह तुमसे पहले लोगो पर फर्ज किये गए थे. ताकि तुम परहेजगार बन जाओ” (सुरह बकरह:१८३)

रमजान वह महीना है जिसमे कुरआन नाजिल किया गया. तुम में से जो शख्स इस महीने को पाए तो उसे चाहिए कि रोजा रखे. हाँ अगर कोई बीमार हो या मुसाफिर तो उसे दूसरे दिनों में यह गिनती पूरी करना चाहिए. (सुरह बकरह:१८५)

रोजे कि फजीलत – Roze ki fazilat

  1. जब रमजान आता है तो आसमान के दरवाजे खोल दिए जाते है, जहन्नम के दरवाजे बन्द कर दिए जाते है और शयातीन को जंजीरों से जकड दीये जाते है. (लिली वर मरजान:६५२, अबू हुरैरह रजी.)
  2. रमजान में उम्र करने से हज कॉ सवाब मिलता है. (मुस्लिम:२२५५-५६, इब्ने अब्बास रजी.)
  3. रमजान में सवाब कि नीयत से रोजा रखने और कयाम करनेवाले के गुजरे सब गुनाह माफ़ कर दीये हते है. (बुखारी:१९०१, इब्ने मजा:१६४१, अबू हुरैरह रजी.)
  4. रोजा क़यामत के दिन रोजेदार कि सिफ़ारिश करेगा. (मुसनद अहमद, तबरानी इब्ने अम्र बिन आस रजी.)
  5. रोजे अक अज्र (बदला) बे-हिसाब है. और रोजेदार कि मुंह कि बू क़यामत के दिन अल्लाहताला को मुश्क कि खुसबू से भी ज्यादा पसंद होगी. (बुखारी:१८९४, मुस्लिम:१९९७,९८, अबू हुरैरह रजी.)
  6. ‘जन्नत में रयान’ नं का एक दरवाजा है, क़यामत के दिन उस दरवाजे से सिर्फ रोजेदार जन्नत में दाखिल होंगे. (मुस्लिम बुखारी:१८९६, इब्ने माजा:१६४० सहल बिन सअद रजी.)
  7. रमजान का पूरा महीना अल्लाहताला हर रात में लोगो को जहन्नम से आजाद करते है. (इब्ने माजा:१६४२ अबू हुरैरह रजी.)
  8. अल्लाहताला हर रोज इफ्तार के वकत लोगो को जहन्नम से आजाद करते है. (इब्ने माजा:१६४३ जाबिर रजी.)

रमजान कि अहमियत – Ramadan ki ahmiyat (value)

  1. रमजान के महीने में एक रात ऐसी है जो हजार महीनो से बेहतर है. जो शख्स इस (कि सआदत हासिल करने) से महरूम रहा, वह हर भलाई से महरूम रहा. (इब्ने माजा:१६६४ अनस रजी.)
  2. उस शख्स कि लिए हलाकत है जिसने रमजान का महीना पाया और अपने गुनाहों कि बख्शीश और माफ़ी ना पा सका (मुस्तदरक हाकिम-काअब बिन उजरा रजी.)
  3. कोई शख्स अगर बगैर शरई उज्र के रमजान का रोजा छोड़ दे या तोड़ दे तो जिन्दगी बार के रोजे भी उसकी भरपाई नहीं कर सकते. (अबू दावूद:२३९६ जईफ, तिरमिजी:६२१ अबू हुरैरह रजी.)

चांद देखने के मसाईल – Chand dekhne ke masail

  1. चांद देखे बिना रमजान के रोजे शुरू ना करो और चांद देखे बगैर रमजान खत्म ना करो. अगर मतबा अब्र मालूद हो तो महीने के ३० दिन पूरे कर लो. (मुस्लिम:१८४, बुखारी:१९०६, इब्ने माजा:१६५४, इब्ने उमर रजी.)
  2. एक मुसलमान कि गवाही पर रोजे शुरू किये जा सकते है. (अबू दावूद:२३४२ इब्ने उमर रजी; इब्ने माजा:१६५२: इब्ने अब्बास रजी.)
  3. शव्वाल (ईद) का चांद देखने में दो आदमियों कि गवाही होना चाहिए. (अबू दावूद: २३४२ रबीअ बिन हिराश रजी.)
  4. रमजान कि पहली तारीख के चांद के बजाहिर छोटा या बड़ा दिखने के शक में नहीं पड़ना चाहिए. (मुस्लिम:१८५९, अबू अल बख्तरी रजी.)
  5. नया चांद देखने पर यह दुआ पढ़ना मसनून है, “अल्लाहुम्मा अहिल्लहु अलैना बिल्युम्नी वल ईमानि वस्सलामति वल इस्लाम, रब्बी व रब्बु कल्लाह” यानि, “ऐ अल्लाह, हम पर यह चांद अमन, ईमान, सलामति और इस्लाम के साथ तुलुअ फ़रमाया. (ऐ चांद, मेरा और तेरा रब अल्लाह है.) (तिरमिजी, मिश्कात:२३१५ तल्हा बिन उबैदुल्लाह रजी.)
  6. (क) चांद देखकर रोजा शुरू करने और चांद देखकर खत्म करने के लिए उस वकत हाजिर इलाके या मुल्क का लिहाज रखना चाहिए. (ख) रमजान में एक मुल्क से दूसरे मुल्क सफर करने पर अगर मुसाफिर के रोजोकी तादाद हाजिर इलाके में माहे रमजान के रोजो कि तादाद से ज्यादा होती हो तो जाईद दिनों के रोजे छोड़ देना चाहिए या नफिल रोजे कि नीयत से रखना चाहिए और अगर तादाद कम बनती हो तो ईद के बाद रोजो कि गिनती पूरी करनी चाहिए. (मुस्लिम १८५८, अबू दावूद:२३३२, तिरमिजी:५९६ इब्ने अब्बास रजी.)
  7. अब्र (बादल) की वजह से शव्वाल (ईद) का चांद दिखाई ना दे और रोजा रख लेने हे बाद मालूम हो जाए की चांद नजर आ चूका है तो रोजा खोल देना चाहिए. (अबू दावूद:२३३९ रबीअ बिन हिराश रजी.)

नीयत के मसाईल – Niyat ke masail

  1. आमाल के अज्र और सवाब का दरों मदार नीयत पर है (बुखारी:०१ उमर रजी.)
  2. जिसने दिखावे का रोजा रखा उसने शिर्क किया. (मुसनद अहमद शद्दाद बिन औस रजी.)
  3. जिसने फजर से पहले फर्ज रोजे की नीयत ना की उसका रोजा नहीं.(अबू दावूद:२४५४, तिरमिजी:६२८ हफ्सा बीनते उमर रजी.)
  4. (क) नफली रोजे की नीयत दिन में जवाल से पहले किसी भी वकत की जा सकती है. (ख) नफली रोजा किसी भी वकत और किसी भी वजह से तोडा जा सकता है. (मुस्लिम:२००४-०५, अबू दावूद:२४५५ आयशा रजी.)
  5. रोजे की नीयत दिल के इरादे से है. मुरव्वजा अल्फाज “व बि सौमि गदिन नवैतु मिन शहरि रमजान” सुन्नते रसूल (स.अ.व.) से साबित नहीं (रोजो के मसाइल)

सहरी व इफ्तारी के मसाइल – Sahri aur iftaar ke masail

  1. सहरी खाओ क्योकि सहरी खाने में बरकत है. (लुलुवल मरजान:६६५ इब्ने माजा: १६९२ अनस रजी.)
  2. हमारे और एहले किताब के रोजे में फर्क सहरी के खाने का है. (अबू दावूद:२३४३, नसाई:२१७० अम्र इब्ने आस रजी.)
  3. सहरी देर से खाना और इफ्तार में जल्दी करना अखलाके नबुवत से है (तबरानी, अबूदर्दा रजी.)
  4. सहरी खाते अगर अजान जो जाए तो खाना फौरन छोड़ देने के बजाय जल्दी जल्दी खा लेना चाहिए.(अबू दावूद:२३५० अबू हुरैरह रजी.)
  5. रोजा इफ्तार करने के लिए सूरज का गुरुब होना शर्त है. (बुखारी:१९५४, मुस्लिम: १८७७, अबू दावूद:२३५१ उमर रजी.)
  6. जब तक लोग इफ्तार में जल्दी करेंगे उस वकत तक खैर व भलाई पर रहेंगे.(लुलुवल मरजान:६६७ सहल बिन सअद रजी.)
  7. ताजा खजूर, छुवारा या पानी से रोजा इफ्तार करना मसनून है.(तिरमिजी, अबू दावूद:२३५६ अनस रजी.)
  8. नमक से रोजा इफ्तार करना सुन्नत से साबित नहीं.(रोजो के मसाइल)
  9. रोजे के इफ्तार पर यह दुआ पढ़ना मसनून है, “जहब्बज्जमउ व्ब्तलल्तिल उरुकु व सब ताल अजरु इन्शा अल्लाह” यानि “प्यास खत्म हो गई, रगें तार हो गई और रोजे का सवाब इन्शा अल्लाह पक्का हो गया” (अबू दावूद:२३५७ इब्ने उमर रजी.) नोट:इफ्तार के वक़्त यह दुआ, “अल्लाहुम्मा लका सुम्तु (व बिका आमनतु व इलैका तव क्कलतु) व अला रिज्किका अफ्तरतु” (अबू दावूद:२३५८) ना पढ़ना बेहतर है. इसलिए के बिरेकित में लिखे अल्फाज हदीसे रसूल में ज्यादती है और बाकी हदीस भी सनदन जईफ है.
  10. जिसने रोजेदार का रोजा इफ्तार करवाया से भी उतना ही सवाब मिलेगा जितना सवाब रोजेदार के लिए होगा और रोजेदार के सवाब (अज्र) से कोई चीज कम ना होगी.(इब्ने माजा:१७४६, तिरमिजी:७०० जेद बिन खालिद रजी.)

रोजे की रुख्सत (छूट) के मसाइल – Roze ki mafi ke masail

  1. सफर में रोजा रोजा रखना और छोडना दोनों जाईज है.(लुलुवल मरजान:६८४, आयशा रजी.) नबी (स.अ.व.) के साथ सफर में कुछ सहाबा ने (रमजान का) रोजा रखा और कुछ ने नहीं रखा और किसी ने किसी पर एतराज नहीं किया (मुस्लिम:१९२३ अबू सईद खुदरी रजी.)
  2. मुसाफिर को रोजा बाद में रखने और आधी नमाज की छूट है और हामिला और दूध पिलाने वाली औरत को भी रोजा बाद में रखने की छूट है. (अबू दावूद:२४०८, इब्ने माजा:१६६७ अनस कअबी रजी.)
  3. सफर या जिहाद में रोजा तर्क किया जा सकता है और अगर रखा हो तो तोडा जा सकता है. उसकी सिर्फ क़ज़ा होगी, कफ्फारा नहीं. रमजान के महीने में एक सफर के दौरान आप (स.अ.व.) ने रोजा तोड़ दिया और लोगो(सहाबा) ने भी तोड़ दिया (लुलुवल मरजान:६८० इब्ने अब्बास रजी. मुस्लिम:१९१३)
  4. बुढ़ापा या ऐसी बिमारी (जिसके खत्म होने की उम्मीद ना हो) की वजह से रोजा रखने की बजाय फिदया दिया जा सकता है. एक रोजे का फिदया एक मिस्कीन को २ (दो) वकत का खाना खिलाना है और उस पर कोई क़ज़ा नहीं. (मुसतदरक हाकिम, दार कतनी इब्ने अब्बास रजी.)
  5. बिमारी, सफर, बुढ़ापा, जिहाद और औरत के मामले में हमल और दूध पिलाने के दिनों में अगर कोई रोजा रखले और रोजा पूरा न कर सके या तोड़ ले तो ऐसी सूरत में सिफत क़ज़ा होगी. (लुलुवल मरजान:६८२, नसाई:२३१९ अनस बिन मालिक रजी.)

क़ज़ा रोजो के मसाइल – Qaza roze ke masail

  1. रमजान के रोजो की क़ज़ा आइन्दा (आनेवाला) रमजान से पहले किसी वकत भी अदा की जा सकती है. (लुलुवल मरजान:७०३ आयशा रजी.)
  2. फर्ज रोजो की क़ज़ा अलग अलग या लगातार दोनों तरह जाईज है.(दार कतनी आयशा रजी.)
  3. मरनेवाले के क़ज़ा रोजे उसके वारिस को रखना चाहिए(लुलुवल मरजान:७०४, मुस्लिम:१९८७ आयशा रजी.)
  4. नफली रोजे की क़ज़ा अदा करना वाजिब नहीं. (अबू दावूद:२४५६ उम्मे हानि रजी.)
  5. अगर किसी ने बादल की वजह से रोजा वकत से पहले इफ्तार कर लिया लेकिन बाद में मालूम हुआ की सूरज गुरुब नहीं हुआ था तो क़ज़ा वाजिब होगी. इसी तरह सहरी खाई और बाद में यकीन हो गया कि सुबह सादिक हो चुकी थी, ऐसी हालत में भी क़ज़ा वाजिब होगी, कफ्फारा नहीं. (बुखारी:१९५९, इब्ने माजा:१६७४ अस्मा बिन्ते अबू बकर रजी.)

वह बाते जिन से रोजा मकरूह नहीं होता – Jin baton se roza makrooh nahi hota

  1. भूल-चूक से खा-पी लेने से (बुखारी:१९३३, मुस्लिम:२००६, अबू दावूद:२३९८ अबू हुरैरह रजी.)
  2. मिस्वाक करने से (इब्ने माजा:१६७७, अबू दावूद:२३६४ आयशा रजी.)
  3. गर्मी कि शिद्दत में सर पर पानी बहाने (नहाने) से. (अबू दावूद:२३६५, बुखारी जिल्द ३ सफा १८९ इब्ने उमर रजी.)
  4. माजी ख़ारिज होने या एह्तेलाम होने से (अबू दावूद:२३७६ इब्ने अब्बास रजी, तिरमिजी:६१८ अबू सईद रजी.)
  5. सर में तेल डालने, कंघी करने या आँखों में सुरमा लगाने से. (इब्ने माजा:१६७८ आयशा रजी., तिरमिजी:६२४ अनस रजी.)
  6. हंडिया का जाये चखने से (बुखारी:जिल्द ३, सफा:१८९ इब्ने अब्बास रजी.)
  7. मक्खी हलक में चले जाने या उसे बाहर निकलने से (बुखारी: जिल्द ३ सफा:१९१ हसन बिन अली रजी.)
  8. थूक निगलने से. (अबू दावूद:२३८६ आयशा रजी.)
  9. नाक में दवा डालने से (बुखारी: जिल्द ३ सफा:१९२ हसन रजी.)
  10. अगर किसी पर गुसल फर्ज हो तो वह सहरी खा कर नमाजे फज्र से पहले गुसल कर सकता है (लुलुवल मरजान:६७७, अबू दावूद:२३८८ आयशा रजी.)
  11. बीवी का बोसा लेने से (बशर्ते कि जजबात पर काबू हो) (लुलुवल मरजान:६७६, अबू दावूद:२३८२, तिरमिजी:६२५ आयशा रजी.)
  12. खुद ब खुद कै आने से (तिरमिजी:६१८ अबू सईद खुदरी रजी.)

वह बातें जो रोजे कि हालत में मना है.

  1. गीबत करना, झूट बोलना, गाली देना और लड़ाई-झगड़ा करना (बुखारी:१९०३, अबू दावूद:२३६२ अबू हुरैरह रजी.)
  2. बेहूदा, बहश और जहालत के काम या बातें करना (लुलुवल मरजान:७०६, अबू दावूद:२३६३ अबू हुरैरह रजी.)
  3. (जो अपनी शहवत पर काबू न रख पाता हो, उसके लिए) बीवी से बगलगीर होना या बोसा लेना. (बुकहरी:१९२७ आयशा रजी; अबू दावूद:२३८७ अबू हुरैरह रजी.)
  4. कुल्ली करते वकत नाक में इसी तरह पानी डालना कि हलक तक पहुच जाए.(तिरमिजी:६८३, अबू दावूद लकीत बिन सबरह रजी.)

रोजे को खराब करने या तोड़ने वाली बातें

  1. (क) रोजे कि हालत में जमाअ करना. इस पर कफ्फारा भी है और क़ज़ा भी. (ख) रोजे का कफ्फारा एक गुलाम आजाद करना, या दो माह के लगातार रोजे रखना या साठ मोहताजों को खाना खिलाना है. (लुलुवल मरजान:६७८, अबू दावूद:२३९० अबू हुरैरह रजी.)
  2. कसदन कै करना. इससे रोजा टूट जाता है और क़ज़ा वाजिब है (अबू दावूद:२३८०, इब्ने माजा:१६७६ अबू हुरैरह रजी.)
  3. हैज (माहवारी) या निफास का शुरू हो जाना. रोजे कि क़ज़ा है, नमाज कि नहीं.(बुखारी:१९५१ अबू सईद रजी, अबू अल जनाद रह.)

नफली रोजे

  1. (रमजान के रोजो के साथ) हर साल माहे शव्वाल में ६ (छह) रोजे रखने का सवाब उम्रभर रोजे रखने कि बराबर है(मुस्लिम:२०४०, अबू दावूद:२४३३, इब्ने माजा:१७१६ अबू अय्युब अन्सारी रजी.)
  2. हमेशा अय्यामे बैद (चांद कि १३-१४-१५ तारीख) के रोजे रखने से उम्रभर के रोजे का सवाब मिलता है. (मुस्लिम:२०३३, अबू दावूद:२४४९, इब्ने माजा:१७०७ अबू कतादा रजी.)
  3. (क) सफर में रोजा रखना जाईज है (अबू दावूद:२४०२ आयशा रजी.) (ख) सफर में रोजा छोडना जाईज है (अबू दावूद:२४०३ हमजा बिन उमर सलमी रजी.) (ग) (क) सफर में रोजा रखना और न रखना दोनों जाईज है (लुलुवल मरजान:६८४ आयशा रजी., ६८५ अबू दर्दा रजी.)
  4. जिहाद के सफर में नफली रोजा रखनेवाले को अल्लाहताला ७० (सित्तेर) साल की मुसाफत के बराबर जहन्नम से दूर कर देते है.(लुलुवल मरजान:७०९, इब्ने माजा:१७१७ अबू सईद खुदरी रजी.)
  5. सोमवार (पीर) और गुरुवार (जुमेरात) को रोजा रखना आप (स.अ.व.) को पसंद था. (अबू दावूद:२४३६ उसामा बिन जैद रजी., तिरमिजी:६४४ अबू हुरैरह रजी.)
  6. यौमे अरफ़ा (९ जिल्हिज्जा) का रोजा रकने से अगले और पिछले एक साल के सगीरा (छोटें) गुनाह माफ़ हो जाते है. जब कि यौमे आशूरा (१० मुहर्रम) का रोजा रखने से गुजरे एक साल के सगीरा (छोटें) गुनाह माफ़ हो जाते है. (मुस्लिम:२०३३ अबू कतादा रजी.)
  7. एक दिन छोड़कर दुर्सरे दिन तोज रखना सबसे अफजल है. (लुलुवल मरजान:७१४, अबू दावूद:२४२७,२४४८ इब्ने उम्र बिन आस रजी.)
  8. रमजान के बाद सबसे अफजल रोजे माहे मुहर्रम के रोजे है. (मुस्लिम:२०३८, अबू दावूद:२४२९ अबू हुरैरह रजी.)
  9. जिल्हिज्जा १ से ९ तारीख के रोजे रखना मुस्तहब है. (तिरमिजी:६५३ आयशा रजी.)
  10. हर माह तिन रोजे रखना मुस्तहब है.(तिरमिजी:६६० आयशा रजी; अबू दावूद:२४४९ कतादा बिन मुलहान रजी.)
  11. हर माह (महीने) के पहले सोमवार (पीर) और पहली दो जुमेरात के रोजा रखना मुस्तहब है.(नसाई:२४१९, अबू दावूद:२४५१ हफ्सा रजी.)
  12. नफली रोजे कि नीयत दीन में जवाल से पहले किसी वकत भी कि जा सकती है, बशर्त कि कुछ खाया-पिया ना हो.(अबू दावूद:२४५५, मुस्लिम:२००४,२००५ आयशा रजी.)

ममनूअ और मकरूह रोजे

  1. ईदुल फितर (रमजान ईद) और ईदुल जुहा (बकरी ईद) के दीन रोजा रखना मना है. (लुलुवल मरजान:६९७, अबू दावूद:२४१६ उमर रजी.)
  2. सिर्फ जुमे के दीन रोजे रखना मकरूह है, अलबत्ता अगर कोई शख्स रोजे रखने का आदी हो और उसमे जुमा आ जाए तो फिर जाइज है. (लुलुवल मरजान:७०१, इब्ने माजा:१७२३ अबू हुरैरह रजी.)
  3. सौमे विसाल (यानि शाम के वकत रोजा इफ्तार न करना और बिना कुछ खाये-पिये अगला रोजा शुरू कर देना) मकरूह है. (लुलुवल मरजान:६७२ अबू हुरैरह रजी.)
  4. लगातार रोजे रखना मना है इसलिए कि “जिसने लगातार रोजे रखे, उसका कोई रोजा नहीं” (लुलुवल मरजान:७१४ अब्दुल्लाह बिन उम्र रजी.)
  5. अय्यामे तशरिक (११-१२-१३ जिल्हज्ज) के रोजे रखना मना है.(मुस्लिम:१९७४, १९७५, अबू दावूद:१४१९ उक्बा बिन आमिर रजी.); अलबत्ता जो हाजी क़ुरबानी न दे सके वह ‘मिना’ में इन दिनों में रोजे रख सकता है. (बुखारी:१९९७,१९९८ आयशा व इब्ने उमर रजी.)
  6. हाजी को अरफ़ात में ९ जिल्हज्जा का रोजा रखना मना है.(लुलुवल मरजान:६८७, तिरमिजी:६४७ मैमूना रजी.)
  7. निफ्स शाबान के बाद रोजे नहीं रखना चाहिए.(अबू दावूद:२३३७, तिरमिजी:६३५ अबू हुरैरह रजी.)
  8. औरत का अपने शौहर कि इजाजत के बिना नफली रोजा रखना मना है.(बुखारी:५१९२, अबू दावूद:२४५८ अबू हुरैरह रजी.)
  9. सिर्फ आशुरा(१० मुहर्रम) का रोजा रखना मकरूह है, ९ और १० या १० और ११ मुहर्रम के रोजे रखना चाहिए.(मुस्लिम:१९६३,१९६४ इब्ने अब्बास रजी.)
  10. सिर्फ शनिवार(हफ्ते) के दीन नफली रोजा रखना मकरूह है.(इब्ने माजा:१७२६ अब्दुल्लाह बिन बसर रजी.)
  11. शक के दीन का रोजा रखना मकरूह है.(नसाई:२१९४ अबू हुरैरह रजी; तिरमिजी:५८९ अम्मार रजी.)
  12. आशुरा का रोजा रखना और न रखना दोनों जाईज है.(तिरमिजी:६५० आयशा रजी.

रमजान में मात्र खानपान पर ही लगाम नहीं लगाई जाती है। रोजा आंखों, जुबान और कान का भी होता है। इस माह में किसी से बुरा नहीं बोलना है, सोचना तक नहीं है। सबसे प्यार से पेश आना है। खास बात यह है कि इस एक माह के मिसाल का असर कई माह तक बना रहता है। वह चाहे समय पर खानपान का हो या लोगों से बातचीत का। हम सभी से अच्छे से पेश आते हैं।

रमजान में जब इबादत करते हैं। नमाज पढ़ते हैं। रोजा रखते हैं तो इसका धार्मिक प्रभाव जीवन में भी उतरता है। कुरान में कही गई बातें जीवन में फिर आती हैं। मसलन, सबसे प्रेम करना, इज्जत करना व लोगों की मदद करना आदि। ईद में तो धार्मिक हदें पूरी तरह टूट जाती हैं। पता नहीं चलता कि ईद की बधाई देने वाला, गले मिलने वाला हिंदू है या मुसलमान।

अहले इल्म हजरात से गुजारिश है कि अगर कही कमी य गलती पाए तो जरुर हमारी इस्लाह फरमाए और आप हजरात से अपील है कि हमारे लिए दुआ करे.

Malik Mehrose
Malik Mehrose is a young entrepreneur, author, blogger, and self-taught developer from Jammu and Kashmir. He is the founder and CEO of SHOPYLL, His startup "SHOPYLL" has emerged a new shine to e-commerce business in Jammu and Kashmir, with a vision to boost the e-commerce ecosystem and to uplift industrialization in Jammu and Kashmir.